Monday, September 25, 2017

जनतंत्र के 'लूट' का मॉडल है झारखंड !


 झारखंड को बने 17 साल होने को है लेकिन झारखंड के हाथ की लकीरें अब तक नही खिंची है . ऐसा लगता है जैसे मानो अभी झारखंड की किस्मत लिखी जानी हो । लेकिन बीते सालों की कहानी देखी जाए तो ये जरूर कहा जा सकता है कि झारखंड को बना कर भी बनाया नही गया ।  यूं देखा जाए तो राज्य पर सबसे ज्यादा बार राज करने का मौका बीजेपी को मिला, खनिज संपदाओं से भरे राज्य में विकास की गाड़ी अब तक दौड़ नहीं पायी है ।  सरकारें दूसरे दलों की भी बनी लेकिन हर किसी ने राज्य के विकास के जहग खुद के विकास पर ही जोर दिया मसलन राज्य आज भी बिखरा हुआ है और संगठित महज वो लोग है जो इस राज्य पर राज कर रहे है । बात शिबू सोरेन की हो, या बाबूलाल मरांडी की राज्य की जनता ने इन नेताओं पर  अपना खूब भरोसा जताया लेकिन ये भी कुछ खास नजर नही आए। शिबू सोरेन की भूमिका तो राज्य को बनाने में रही लेकिन वो भी पार्टी और बेटे से इधर उधर देख न सके और रोज झारखंड पिछड़ता चला गया ।  मौजूद दौर में राज्य में बीजेपी की सरकार है , बीजेपी को इस बार लगभग जनता ने पूर्ण बहुमत के करीब पहुँचाया लेकिन बीजेपी की सरकार में भी भारी निराशा देखने को मिल रही है,हालांकि सरकार ऐसा नही मानती है ।


सरकार खुद के  1000 दिन को मुंबई से लेकर दिल्ली और दिल्ली से लेकर  मध्यप्रदेश तक प्रचार कर जश्न मना रही है ।  जबकि सच्चाई जमीन पर कुछ और ही है ।  जमीन अधिग्रहण के दौरान अपना हक मांग रहे लोगों पर गोली चलवाने का मामला हो या फिर गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का दांव हो, हर तरफ इन मसलों पर अप्पति है क्योंकि झारखंड का मिजाज तो बिना आदिवासियों के इतर बनाया नही जा सकता, तो ऐसे में झारखंड में विकास की बात आज भी बैमानी सी ही लगती है ।  जिला अस्पतालों की सच्चाई छुपाए नही छिप रही है और सरकारी विभाग का लचर रवैया लोगों की जान तो लेता ही रहा है ।  अब बात रांची की ही ले लीजिए , सेवा सदन अस्पताल के सामने स्थित पार्किंग में एक पेड़ से  शिव सरोज का  झूलता शव मिला था . युवक ने दो गमछे की मदद से फांसी लगा ली थी .  पीएमओ और डीजीपी समेत अन्य अधिकारियों को भेजे गये अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा था कि चुटिया थाना की पुलिस के व्यवहार से क्षुब्ध होकर वह जान देने जा रहा है. उसने अपने पिता को पुलिस के जुल्म से बचाने की भी गुहार लगायी थी. आप सोच लीजिए जिस राज्य की राजधानी में खुलेआम ये सब होता हो वहाँ दूसरे जिलों का हाल क्या होगा ? और सत्ता बेलागम इसलिए भी दिखती है क्योंकि उसे इस बात का अंदाजा बखूबी है कि विपक्ष तो वही घिसीपिटी राजनीति ही करेगा ।  जब धनबाद चंद्रपुरा रेल लाइन को बंद किया जा रहा था तब बीजेपी के सांसद और विधायकों ने चूं तक न कि और जब एक झटके में 30 लाख लोगों को बेसहारा कर दिया गया तो फिर सत्ता में बैठे लोग ही राजनीति पर उतारू हो गए । विधायक से लेकर सांसद और सांसद से लेकर राज्य और केंद्र में सरकार बीजेपी की बावजूद उसके जनता को बेसहारा कर दिया गया । हज़ारो लोग जिनका जीवन उस रेल रुट के सहारे चल रहा था वो एक झटके में लाचार हो गए लेकिन बीजेपी विधायक ढुल्लू महतो से लेकर सांसद पीएन सिंह और गिरिडीह के सांसद रविन्द्र पाडेय जनता को झूठा दिलासा देते रहे और नाम मात्र का विरोध करते रहे, अब असल सवाल की शुरुआत भी यही से है कि सरकार जिनकी है क्या उनकी भी नही सुनी जा रही है ? तो फिर सुनी किसकी जा रही है और सरकार काम किसके लिए और किसके इशारे पर कर रही है ? दरअसल झारखंड को लेकर वादे और संकल्प तो साल 2000 से लिये जा रहे है लेकिन जिस झारखंड में बिरसा को भगवान माना गया उनके घर को भी आज तक सरकारें कंक्रीट का नही बनवा पायी लेकिन राजनीतिक पर्यटन होता रह गया ।


 झारखंड के साथ मूल सवाल आदिवासियों का है लेकिन मौजूदा तस्वीर में झारखंड के आदिवासी उस खोई हुई विरासत की तरह हो गए है जिनकी प्रदर्शनी प्रधानमंत्री, राज्यपाल या किसी विदेशी राजदूत के सामने नाँच और गाने के जरिये ही की जा रही है । आदिवासियों के बच्चों के लिए न तो सही शिक्षा है, न अस्पताल की व्यवस्था, मतलब इलाज के लिए भी आपको राजधानी का ही रुख करना होगा क्योंकि सरकारी मशीनरी अब भी सही तरीके से गांवों में पहुंच नही पायी है और छोटी छोटी बीमारी ही लोगों के मौत की वजह बन गयी लेकिन याद करें तो हर सरकार ने आदिवासियों के हित मे काम करने का वादा किया था । झारखंड में सरकारों की दृढ़ता का अंदाजा इसी से लगता है कि साल 2014 तक के आंकड़े बताते है कि राज्य में 70 प्रतिशत महिलाएं  एनीमिया से पीड़ित है और जच्चा बच्चा मृत्यु दर देश के औसत दर 212 को लांघ कर  261 पर पहुंच चुका है । राजधानी रांची से 200 किलोमीटर दूर आदिवासी इलाका सारंडा की तस्वीर हर उस इंसान को अंदर से हिला के रख देगी जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर यकीन करते हुए वोट किया हो । दरअसल 2017 में सरकार के आंकड़े मानते है कि वहाँ 20 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है जबकि सच्चाई उससे और अधिक भयानक है ।  न वहाँ पीने का साफ पानी है , न खाने को खाना, लगभग वहाँ के आदिवासी  बरसाती कीड़े को मारकर खाने के कगार पर है ।झारखंड में सरकारी डॉक्टरों के कुल 2900 पद है लेकिन सेवा 1600 डॉक्टर ही दे रहे है । राज्य में महज 3 सरकारी मेडिकल कॉलेज है जो मात्र हर साल 200 डॉक्टर ही राज्य को दे रहे है । वहीं 29.74 लाख हेक्टयर जमीन साल 2014  में सिंचाई के लिए उप्लब्ध थी लेकिन सिंचाई की सुविधा महज 25 प्रतिशत जमीन पर ही उपलब्ध थी और अब भी हालात नही बदले है । 17 साल के उम्र वाले राज्य में सबसे ज्यादा  राज तो बीजेपी ने किया लेकिन सत्ता का जलवा तो यही है कि मौजूदा सीएम पिछली सरकारों को ही दोष देते दिखते है ।


 रघुवर राज में ही शांत और अपने सौहार्द के लिए जाने जाना वाला राज्य गौ हत्या और मॉब लीनचिंग के लिए बदनाम हो गया है लेकिन सरकार अब भी मान रही है कि राज्य में तो राम राज है । लेकिन सच्चाई यही है कि बीजेपी के विधायक ढुल्लू महतो तकरीबन दर्जनों भर मुकदमा झेल रहे है उसमें रंगदारी मांगने जैसे भी कई आरोप शामिल है , तो वही सीधे तौर पर झरिया विधायक संजीव सिंह भी सरेराह कांग्रेस के नेता और धनबाद के पूर्व डिप्टी मेयर की हत्या के आरोप में जेल जा चुके है , जमशेदपुर में बच्चा चोर के नाम पर बिगड़ती कानून व्यवस्था की तस्वीर भी कोई भूल नही सका है ,तो फिर रघुवर दास किस बिनाह पर राज्य में सब ठीक है का डंका बजा रहे है ? वजह चाहे जो भी हो लेकिन झारखंड के तमाम राजनीतिक दल सत्ता के छावं तले खूब बढ़ रहे है और जनता इन्हीं राजनीतिक दलों के आसरे विकास की बांट जोह रही है जो फिलहाल रघुवर राज में उन्हें नसीब होती दिख नही रही । तो फिर ये कहना तो जायज है कि जिस छोटे राज्य का कॉन्सेप्ट बीजेपी हमेशा देश के सामने देते आयी वहीं बीजेपी छोटे राज्य झारखंड  का विकास करने में विफल है ।

Tuesday, September 12, 2017

कहीं देश को तानाशाह किम जोंग से प्यार तो नही हो गया ?

 लोकतंत्र है क्या बता सकते हो अमा यार छोड़ों तुम का बताओगे, तुम खुद ही नहीं समझ पा रहे हो की तुमको लोकतंत्र से मोहब्बत है या फिर फांसीवाद पर तुम्हारा लस्ट है ? जब पता चल जाएं तो बता देना वैसे उम्मीद नहीं है हमको की तुम लोग कन्विंस भी होते हो  हरियाणा वाला बाबा से हर पार्टी सत्ता के लिए डील तो बारी बारी कर लिया, जिसका नतीजा हुआ न्यायपालिका के आदेश के बाद पब्लिक बौरा गई, गाड़ी जलाई, बिल्डिंग जलाई, मीडिया वालो को मारा और फिर खुद 38 आदमी निपट गया. हालातों ने बताया की सरकार पूरा फेल हो गई है लेकिन सरकार का समर्थक लोग पूरा ढीठ पना दिखाया, उसके पहले हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष का बेटा भी बेटी उठाओ मुहिम में पकड़ाया तो लड़की के करेक्टर पर समर्थक लोग लोटा ले के चढ़ गए. खैर इन सब मामलों के बाद बारी आई गौरी लंकेश की, उसके मारे जाने पर हंगामा इसलिए हुआ क्योंकि कन्नड़ में उन्हें पढ़ा जाता था जिसके वजह से लोग डरे हुए थे कि वो एक्सपोज हो जाएंगे, गौरी लंकेश को किसने मारा ये तो बाद में पता लगेगा लेकिन जो लोग उनकी हत्या को जायज ठहरा रहे थे उनको देखकर मन तो खिन्न हो गया. बताईये महाराज कोई किसी महिला को कुतिया कह रहा है क्योंकि वो आपके जैसा नहीं सोचती, सोच में अलगाव तो एक घर के अंदर भी दिखता है, कई बार पापा लोग भी कुछ अलग राय रखते है और आप कुछ और तो फिर आपके पापा क्या हुए  ? चलिए छोड़िए आप कह रहे है कि सरकार का विरोध करने वाला पत्रकार सब दलाल है ?  दलाल का मतलब आपको पता है जी, और बढ़िया पत्रकार का क्या मतलब है यहीं बता दो अरे तुम लोग तो सब लुल दिमाग का है जानता भी नहीं है कि भाई सरकार में आने से पहले पार्टी कहती थी कि ये करेंगे, वो करेंगे, अब सत्ता में आई तो एक काम की और दुसरा नहीं की तो क्यों न कहे कि सरकार गलत कर रही है ?  कोई हमको गरज तोड़ी था, आप ही न माइक लगा लगा कर वोट मांग रहे थे जी, दिए वोट आपको, फिर गाड़ी भी मिला, सैलरी भी मिला, और पूरा फुटानी आपका पूरा हो रहा है, आम जनता को रोक कर आपको साफा रोड़ दिया जाता है कि आप जहां जा रहे है वहां जल्दी पहुंचइये, भले हम लोग लेट हो जाएं तो कंपनी सैलरी काट लेती है. तो बताईये भाई काहे नहीं बोलेंगे जब आप किया हुआ वादा पूरा नहीं करेंगे तो वोटर है, पत्रकार है, स्वतंत्र राय है, स्वागत कीजिए हमारे आलोचना का, कुछु बोलते है तो आप लोग दलाल दलाल का बाजा बजाने लगते है. 


आपलोगों को क्या नॉर्थ कोरिया वाला तानाशाह किम जोंग पंसद है जानते भी हैं कुछ उसके बारे में, सुत भी जाइयेगा तो गोली मार देता है, कोई विदेशी फिल्म नहीं देख सकते और आपलोग बताईये हमलोग को सुअर और कुतिया पता नहीं और क्या-क्या बोलते रहते है ?  खैर बौधिक स्तर अगर ठीक हो आपका तो थोड़ा डाटा डाटा खेला जाएं क्या ?  नोटबंदी पर पीएम मोदी ने बोला था कि कालाधन आएगा, आंतकी गतिविधि रुक जाएगी लेकिन कहां कुछ हुआ यार आरबीआई की रिपोर्ट है कि नोटबंदी के दौरान बैन किए गए 1000 रुपये के पुराने नोटों में से करीब 99 फीसदी बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट आए हैं. 1000 रुपये के 8.9 करोड़ नोट नहीं लौटे हैं. पिछले साल नवंबर में लागू की गई नोटबंदी के दौरान देश में प्रचलन में रहे 15.44 लाख करोड़ रुपये के प्रतिबंधित नोट में से 15.28 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट कर आ गए हैं. सत्ता में आने से पहले बोल रहे थे कि पाकिस्तान को मार के धांस देंगे. मोदी सरकार के तीन साल और यूपीए के आखिरी 3 सालों के मुकाबले कश्‍मीर में आतंकवाद से 42 फीसदी ज्‍यादा मौतें हुई. मोदी के शासनकाल के तीसरे साल में जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद के कारण 293 मौतें हुईंजो इसी सरकार के दूसरे साल के कार्यकाल में हुई 191 मौतों से 53 फीसदी अधिक रहा. बीते साल की तुलना में इस साल आतंकवादी हमलों में 61 फीसदी अधिक जवान शहीद हुए. उधर राष्ट्रवाद का सरकार बांसुरी बजाती रही और देश के जवान मरते रहे. एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जवानों की समस्याएं सुलझाने में नरेंद्र मोदी सरकार नाकाम रहीहर साल में 100 से ज्यादा सैनिक अब भी खुदकुशी करते है. बताइये महाराज पहले 60 रुपया का तेल और दाल हमलोग लाते थे तो मनमहोन सिंह को क्या क्या नहीं कहा गया, अब दाल 80-100 से ऊपर रहती है, जैसे 60 रुपया तो सौतन हो उसकी और तेल भी 70 के ऊपर है, जबकि पहले 60 का तेल तब मिलता था जब क्रूड ऑयल 120 डॉलर प्रति बैरल था लेकिन वहीं क्रूड ऑयल अब 54 डॉलर प्रति बैरल है और दाम 70 के उपर, देश की सरकार पर कोई सवाल अब उठाया नहीं जा सकता पता नहीं कब और कौन बोले की देखो भारत मां के प्रति समर्पित सरकार पर उंगल कर रहा है ?

भाई इससे बढ़िया तो पिछली लूटने वाली सरकार थी बताओ उतना लूटा फिर भी दाल 60 का खिलाई और राष्ट्रवादी लोग जब सत्ता में आए, भ्रष्टाचार भी बंद है और अंबानी अडानी को कोई फायदा भी नहीं दे रहे हैं तो दाल तेल सब मुहं फुला के ऊपर कैसे चढ़ गया है ?  ज्यादा बोलेंगे नहीं, पता चला की आप हमको भी फर्जी हिंदू बताके कभी पेल दीजिएगा. उ क्या है न कि आपलोग को हिंदू मुसलमान करके झगड़ा करने में बहुत मजा आता है इससे सबके दिमाग में से जितना स्वास्थ्य, शिक्षा का मुद्दा है सबका बत्ती बन जाता है, बाद बाकी यार सरकार की आलोचना करते है और करते रहेगे. लोकतंत्र है क्या इसका रिसर्च कर लीजिए समझे