Friday, November 17, 2017

पद्मावती, पद्मिनी या फिर एक कल्पना ? – इतिहास पर आधारित एक पड़ताल



पद्मावती पर जितने इतिहासकार और साहित्यकार हैं... उनकी राय अलग-अलग है... पद्मावती  पर जानकार अभी तक एक मत नहीं बना पाये हैं... लेकिन पद्मावती को लेकर सबसे ज्यादा जो कहानी जानी जाती है वो अब हम आपको दिखाने जा रहे हैं... सबसे ज्यादा लोकप्रिय कहानी में पद्मावती के असतित्व को माना गया है... इस कहानी में पद्दमावती चितौड़गढ़ के राजा रत्नसिंह की पत्नी थीं...  वो बहुत खूबसूरत थीं.... और उनपर दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी आशक्त हो गया था.... उन्हें पाने के लिए उसने चितौड़गढ़ पर हमला कर दिया था..  भारी लड़ाई के बाद दुश्मन के चंगुल में जाता देख पद्मावती ने 16 हजार राजपूत औरतों के साथ आग में कूदकर जान दे दी थी... फिलहाल तो  उत्तेजित लोगों से सिर्फ इतना विनम्र निवेदन है कि सुनी सुनाई बातों पर अपना और समाज का ब्लड प्रेशर न बढ़ाएं.... वैसे ये सबको मालूम है कि संजय लीला भंसाली की फिल्म `पद्मावती' का कुछ लोग विरोध क्यों कर रहे हैं... और ये वजह है एक मनगढ़ंत धारणा कि... जिसमें भंसाली ने पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच किसी तरह का प्रेम दिखाया है... जब भंसाली खुद इसे नकार चुके हैं... तो विरोध कर रहे लोगों को ये कहां से जानकारी मिल गई कि फिल्म में ऐसा कुछ है?..... पद्मावती और खिलजी में प्रेम  जायसी ने भी नहीं दिखाया है... जिनकी रचना `पद्मावत' के आधार पर ये फिल्म बनी है....  फिर लोग क्यों एक बेसिरपैर की बात पर हंगामा कर रहे हैं?.... हालांकि इतिहास सम्मत इसी धारणा को अगर माना जाये तो `पद्मावती' एक कल्पित चरित्र है... और ये कल्पना की थी मलिक मोहम्मद जायसी ने जो हिंदी के एक अमर कवि हैं... जायसी ने जिस कल्पित चरित्र को अपनी रचना का आधार बनाया वो आज ऐतिहासिक जान पड़ने लगी है..... ये साहित्य और कल्पना की ताकत है...  मिथक और इतिहास के ये अंतर्संबंध अलग व्याख्या की मांग करता है...   अब जबकि संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावतीएक दिसंबर को रिलीज़ होने जा रही है तो इसे लेकर युद्ध शुरू हो गई है.....
  करणी सेना के लोग इस बात को समझने और मानने को तैयार नहीं हैं कि पद्मावतीया पद्मिनीएक कल्पित चरित्र है और इस चरित्र की पहली कल्पना 1540 में अवधी और हिंदी के कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने काव्य-ग्रंथ पद्मावतमें की थी....
इस काव्यग्रंथ की पृष्ठभूमि में 1303 में हुई अलाउद्दीन ख़िलजी द्वारा चितौड़ पर चढ़ाई और विजय है.... इस तरह देखें तो जायसी ने अलाउद्दीन ख़िलजी द्वारा चित्तौड़ पर चढ़ाई और विजय के  237 साल बाद अपने काव्यगंथ की रचना की थी.
237 साल बाद. ख़िलजी शासन के सबसे प्रामाणिक इतिहासकारों में से एक किशोरी लाल शरण ने भी माना है कि पद्मिनी एक काल्पनिक चरित्र है.... फिर भी न करणी सेना और न कुछ दूसरे लोग इसे मानने को तैयार हैं..... उनके तर्क भी अजीब हैं.... जैसे- चित्तौड़ में पद्मिनी महल है इसलिए पद्मिनी थीं....
ऐसे लोग ऐतिहासिक प्रमाण पेश नहीं करते कि सच में कोई पद्मिनी नाम की रानी थीं और उन्हें लेकर ही अलाउद्दीन ख़िलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया है... ख़िलजी ने आक्रमण ज़रूर किया था.. लेकिन उसकी वजह पद्मिनी नहीं थीं.... ऐसा कई इतिहासकार मानते हैं...
 पद्मिनीया पद्मावतीको लेकर इतिहासकार से लेकर साहित्याकर सब बंट गये हैं.... हलांकि इसे भी नकारा नहीं जा सकता है कि... पद्मावतीके होने कोई प्रमाण नहीं है... ऐसे में सवाल ये उठता है कि  पद्मिनीया पद्मावतीको लेकर बवाल क्यों हो रहा है?... ये समझने की ज़रूरत है.... कई बार ऐसा होता है कि साहित्यिक कृतियों में आए काल्पनिक चरित्र इतने प्रभावशाली हो जाते हैं कि ऐतिहासिक और वास्तविक चरित्रों से अधिक लोकमानस को प्रभाविक करते हैं....
इसका एक उदाहरण 1897 में आईं ब्रेम स्टोकर का उपन्यास ड्रैकुला  है... जिसने कई फिल्मों और विधाओं को जन्म दिया है.... ड्रैकुला का मिथक यथार्थ से ज़्यादा ताक़तवर हो चुका है.... जबकि कोई ड्रैकुला था ही नहीं.
दूसरा उदाहरण भारतीय है.... के. आसिफ़ की फिल्म मुगल-ए-आज़म’.... ये भी अनारकली के मिथक पर आधारित है.... अब्दुल हलीम शरर और इम्तियाज़ अली ताजजैसे उर्दू लेखकों ने अनारकलीका मिथक रचा..... जिसे के. आसिफ़ ने अपनी फिल्म के माध्यम से भारत के घर-घर में पहुंचा दिया..... ऐसा ही कुछ पद्मिनी के साथ हुआ....
मशहूर गीतकार, लेखक और शायर जावेद अख्तर ने भी कहा है कि, ‘पद्मावतीकी कहानी सही मायनों में ऐतिहासिक है ही नहीं.... वो मानते हैं कि पद्मावतीकी कहानी उतनी ही नकली है जितनी कि सलीम और अनारकली की कहानी...
आशुतोष गोवारीकर की फिल्म 'जोधा-अकबर' का जिक्र करते हुए भी जावेद अख्तर समेत कई इतिहासकार और साहित्यकार ने कहा है कि इतिहास के मुताबिक अकबर की जोधा बाई नामक कोई पत्नी थी ही नहीं...
इतिहासहीन लोगों को ये अनुमान नहीं हो सकता है कि मलिक मुहम्मद जायसी की रचना के कारण पद्मिनी का कल्पित किस्सा कई साहित्यिक रचनाओं... फिल्मों और धारावाहिकों में ऐसे आया.... मानों वो ऐतिहासिक चरित्र हैं.....

मूल अवधी में लिखी गई जायसी की रचना के फारसी में कम से कम बारह रूपांतरण हुए और उनमें पद्मिनीया पद्मावतीका किस्सा आया है.... राजस्थान की भाषाओं में भी पद्मिनी के किस्से पर गाथाएं रची जाती रहीं.....
राजस्थानी इतिहास के वृंतात लिखने वाले अंग्रेज़ कर्नल जेम्स टॉड ने भी इन गाथाओं के बारे में लिखा और उसके कारण आधुनिक युग में पद्मिनी का किस्सा बंगाल पहुंचा जिस पर देवकी बोस ने 1934 में मूक फिल्म कामोनार अगुनभी बनाई....
यहां तक कि दक्षिण में चित्रापु नारायण राव ने चित्तौड़ रानी पद्मिनीनाम की फिल्म भी बनाई जिसमें शिवाजी गणेशन और वैजयंती माला बाली ने भूमिकाएं निभाईं....
1954 में आई हिंदी फिल्म जागृतिमें एक गाना है जिसका मुखड़ा है- आओ बच्चों! तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’….  इस गाने में एक पंक्ति आती हैकूद पड़ी थी यहां हजारों पद्मिनिया अंगारों पे’.....
1964 में हिंदी फिल्म पद्मिनीभी आई.... इस तरह पद्मिनी का मिथक बढ़ता गया.... भंसाली की आने वाली फिल्म भी इस तरह लगभग 475 साल पहले रचे गए एक मिथक की नई पेशकश हैं.... और ऐसा होने में कुछ गलत भी नहीं है.... मिथक लगातार बनते हैं और उनको इतिहास समझने की भूल भी होती रही है....

मलिक मुहम्मद जायसी का अपना जीवन भी कई तरह की किंवदंतियों से भरपूर है.... जायसी की एक आंख नहीं थी…. एक किस्सा तो इसी को लेकर है... कहते हैं कि शेरशाह से जब उनकी पहली मुलाकात हुई तो वो जायसी को देखकर हंसा. जायसी ने पूछा, ‘ मोहिका हससि, कि कोहरहि?... यानी मुझ पर हंस रहे हो या मुझे बनाने वाले कुम्हार यानी ख़ुदा पर?... कहते हैं शेरशाह इस पर लज्जित हुआ.
दूसरी किंवदंती ये है कि जायसी ने अपने स्थानीय राजा से कहा, ‘मैं किसी राजा के तीर से मरूंगा.एक दिन वो राजा जंगल में शिकार खेलने गया और एक शेर को देखा... राजा ने तीर चलाके उसे मार दिया. बाद में देखा कि शेर मरने के बाद जायसी के शव के रूप में बदल गया... यानी जायसी ने ख़ुद हठयोग से शेर का रूप धर लिया था.... हो सकता है कि आने वाले समय मे जायसी पर भी फिल्म बने.....
संजय लीला भंसाली की पद्मावतीका अंत कैसा होगा, ये जिज्ञासा का विषय है.... जायसी ने तो ये दिखाया है कि अलाउद्दीन ख़िलजी युद्ध जीत लेने के बाद पाता है कि उसे एक मुट्ठी राख के सिवा कुछ नहीं मिला... जायसी का पद्मावतयुद्ध की व्यर्थता के बोध को दिखाने वाली रचना है... मध्यकालीन हिंदी साहित्य के आधिकारिक विद्वान प्रो. नित्यानंद तिवारी कहते हैं कि पद्मावतप्रेम की पीड़ा को रेखांकित करने वाला काव्य है.... क्या भंसाली की फिल्म में प्रेम की ये पीड़ा दिखेगी? या कुछ और....


 लेखक -  पुरुषोत्तम कुमार, टीवी पत्रकार  
नोट - इस लेख को इतिहासकारों के लेख पर आधारित होकर लिखा गया है. भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोई साजिश न समझी जाएं, बल्कि लेख को गलत साबित करने के लिए नए तथ्य सामने लेकर आएं. – ऋषिराज



Friday, November 10, 2017

मुख्यमंत्री जी ! धनबाद तो आ रहे है सवालों के जवाब भी लेते आईयेगा !

13 नंवबर को झारखंड के मुख्यमंत्री धनबाद आ रहे है, उनका फूलों से स्वागत होना चाहिए और उनकी लंबी उम्र की कामना शक्ति मंदिर में होना चाहिए. बहरहाल जैसे मैने सुना की मुख्यमंत्री रघुवर दास13 नवंबर को विनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय का शिलान्यास करेंगे तो मैं बेचैन हो गया. मेरी बेचैनी का हर कारण बताउंगा आपको, इसका राजनीतिक आंकलन से ज्यादा बेहतर सामाजिक आंकलन हो तो मुझे बहुत संतुष्टी होगी लेकिन मुझ नाचीज की राय बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती क्योंकी मेरा महत्व महज एक वोट का है और मेरे साथ कोई हजारों वोटर भी नहीं है. लेकिन जिन्होने हजारों लाखों वोट लेकर सत्ता संभाली उनके दौरे को लेकर एक स्वस्थ्य माहौल में सवाल तो होने चाहिए. मुख्यमंत्री विश्वविद्यालय का नींव रखेंगे, अच्छी बात है क्योंकि शिक्षा से ही समाज की तस्वीर बदली जा सकती है. लेकिन क्या मुख्यमंत्री धनबाद के एक किसी कॉलेज को उठा कर बता सकते है कि है इस कॉलेज और यहां पढ़ने वाले बच्चे इतने तेज है कि वो देश में किसी भी कॉलेज को टक्कर दे सकें आप, पी के रॉय कालेज से लेकर जिले का कोई भी कॉलेज उठा लिजिए ?  तस्वीर एक जैसी होगी ?  मुख्यमंत्री रघुवर दास ने हाल में लाखों करोड़ों रुपए कॉलेजों के लिए जारी किए लेकिन ये चिंता 3 साल बाद क्यों हो रहीं है क्या इसलिए क्योंकि 2019 का लोकसभा चुनाव भी है औऱ काम के लिए राज्य सरकार के पास 1 साल क्योंकि अंतिम साल में तो बस चुनावी एजेंडों की छपाई औऱ दिखाई होती है.मुख्यमंत्री जी धनबाद आ रहे है तो शिक्षा के साथ कई और मामलों पर भी उनका ध्यान जिम्मेदार नागरिक होने के कारण दिलाना चाहिए. अब पानी का मसला ही ले लिजिए हर अखबार जिले के अलग अलग शहरों, कस्बों के दिक्कत से पटा रह रहा है. कहीं पानी न पहुंचने की समस्या है तो कहीं गंदा पानी लोगों तक पहुंच रहा है. जरा  महुदा तेलमच्चो का ही हाल जान लीजिए, ग्रामीण जलापूर्ति योजना के नाम पर 11 करोड़ 79 लाख रुपए खर्च किए जाने के बाद भी आम जनता को इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है, इस योजना का उद्‌घाटन मुख्यमंत्री द्वारा ऑनलाइन किया गया था, यहां के लोग तब से ऑन लाइन ही पानी पी रहे हैं, योजना साल 2013-14 में तत्कालीन पेयजल स्वच्छता मंत्री जयप्रकाश भाई पटेल के कार्यकाल में बनी थी, जिसकी स्वीकृति वर्तमान पीएचईडी मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी के कार्यकाल में मिली, बड़े तामझाम गाजे-बाजे के साथ 23 जनवरी 2015 को बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो द्वारा खेलाय चंडी प्रांगण में इस योजना का शिलान्यास किया गया, जिससे पीएचईडी के आला अधिकारी, कार्य एजेंसी संवेदक मेसर्स दरोगा प्रधान के प्रतिनिधि सहित सैकड़ों लोग शामिल थे, शिलान्यास के समय लोगों के बीच उम्मीद जगी थी कि अब यहां के लोगों की पानी की समस्या का पूर्ण रूप से समाधान हो जाएगालेकिन आज तक ये योजना पूर्ण रुप से धरातल पर उतरी ही नहीं. ये जगह तो सेंपल भर है आप धनबाद के जिस कोने में भी जाएंगे वहां पीने की साफ पानी की समस्या से आप रुबरु होंगे. शिक्षा और पानी के बाद में स्वास्थ्य पर बात नहीं करुंगा बस इतना ही कहुंगा की कम से कम वोटरों के जान की चिंता सरकारों को होनी ही चाहिए. कानून व्यवस्था को लेकर बात की जाएं तो सीएम साहब की नैतिकता कई सवालों से घिर जाती है. मसलन बाघमारा के विधायक ढुल्लू महतो की बात करें तो सरकार उनके उपर से आपराधिक मुकदमे हटाना चाहती थी लेकिन वो तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इसपर रोक लगाया. सीएम साहब की पार्टी के विधायक ढुल्लू महतो को लेकर साल 2016 15 फरवरी को एक गजब की खबर सामने आई जिसपर विधायक जी पर आरोप लगा कि उन्होने रुसी कंपनी से ही रंगदारी मांग ली. इसको लेकर सीएम को चिट्ठी तर लिखी गई, विपक्ष ने सवाल किए लेकिन विधायक ढुल्लू महतो ने तमाम आरोपो को खारिज कर दिया. ये खबर एनडीटीवी से लेकर बीबीसी तक ने छापी ,लेकिन आपने इसपर क्या किया ? इसी 7 नवबर को उनके समर्थकों पर मजदूरों को बाघमारा के ब्लॉक 2 में दौडा- दौड़ा कर पीटने का आरोप लगा. सिर्फ एक विधायक ही क्यों , झरिया के विधायक संजीव सिंह को ले लिजिए, इनपर तो कांग्रेस के पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह की हत्या के आरोप लगे, वो जेल में बंद है, लेकिन आपने उन्हे अपनी पार्टी ने बनाए रखा है क्या ऐसे लोगों का सरकार समर्थन करती है ? अगर जवाब ना में है तो फिर पार्टी की तरफ से अबतक कार्रवाई क्यों नहीं हुई आप तो सीएम है पार्टी में आपकी बात कौन काट सकता है आप कहते है कि कानून व्यवस्था बनाये रखना प्राथमिकता है तो फिर मुकदमा वापस लेने की नीति कौन सी परिपाटी का परिचय देती है हो सकता है कि मेरी बात पर आपको यकिन नहीं हो, लेकिन आपके पार्टी के ही सांसद पीएन सिंह ने कहा कि धनबाद की कानून व्यवस्था बिगड़ गई है, इसके जनता में आक्रोश है, विकास का काम ठप है तो फिर क्या सांसद साहब की बात भी मायने नहीं रखती वैसे तो राज्य और केंद्र में आपकी पार्टी की ही सरकार है तो फिर समन्वय क्यों नहीं है धनबाद-चंद्रपुरा रेल लाइन को लेकर आज तक कोई मुआवजे की बात हुई नहीं और आपकी पार्टी के विधायक सड़कों पर प्रदर्शन करते रहे तो फिर इसे क्या समझा जाएं, ये मजह दिखावे की राजनीति है  जिससे वोटों की फसल लहलहाती है और यहीं धारा झारखंड सहित धनबाद को बर्बादी की ओर ढकेल रही है जहां विकास की संभावनाएं लाख है. आखिर में यहीं कहूंगा की सीएम साहब आएं तो उन्हें पानी जरुर बोतलबंद पिलाइयेगा.    

Sunday, October 15, 2017

‘बेगुनाह’ हैं तलवार दंपित ? : आरुषि-हेमराज का हत्याकांड एक ‘अर्धसत्य’

आरुषि हेमराज हत्याकांड एक अर्धसत्य इसलिए क्योंकि आरुषि हेमराज की हत्या हुई ये सत्य है लेकिन इनका हत्यारा कौन है ये कोई नहीं जानता. बीतते वक्त के साथ भले ही 14 साल की आरुषि के खून के धब्बे बिस्तर से साफ हो चुके है. हेमराज के खून के धब्बे भी उस छत से गायब है जिस छप पर उसकी लाश मिली थी, लेकिन वो मुट्ठी भर लोग आज भी उस सूर्ख लाल खुन के धब्बों को भूला नहीं पाएं है, कानून आजतक आरुषि और हेमराज को न्याय नहीं दे पाया है.हर कोई ये जनाने को बेताब है कि आखिर आरुषि हेमराज का हत्यारा कौन है, हर कोई अपनी-अपनी सोच से इस हत्या का गुनहगार तय कर रहा है लेकिन इस हत्याकांड का असली दोषी जिसे निचली अदालत ने ठहराया उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ये कहते हुए बरी कर दिया कि जांच एजेंसियों को पास पर्याप्त सबूत नहीं है तलवार दंपति को दोषी कहने के लिए. तलवार दंपति को निर्दोष इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इस मामले की जितने भी लोगों ने जांच की, उन सभी ने ये माना है कि तलवार दंपति को हत्या का दोषी मानने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं.
जांच में अलग-अलग तथ्य
इस दोहरे हत्याकांड की जांच कुल तीन अलग-अलग जांच दलों ने की थी. शुरूआती जांच नॉएडा पुलिस ने की, इसके बाद यह मामला सीबीआई को सौंपा गया और कुछ समय बाद इस टीम को बदलकर यह जांच सीबीआई की ही एक नई टीम को सौंप दी गई थी. दिलचस्प यह भी है कि इस मामले में देश की सर्वोच्च जांच संस्था की दो अलग-अलग टीम बिलकुल विपरीत दिशाओं में जाती दिखती हैं. सीबीआई की पहली टीम यह मान रही थी कि यह हत्याएं हेमराज के दोस्तों - कृष्णा, राजकुमार और विजय - ने की हैं. जबकि सीबीआई की दूसरी टीम ने माना है कि हत्याएं तलवार दंपति ने की हैं.

दो अलग- अलग पक्ष
सीबीआई की पहली टीम को कृष्णा, राजकुमार और विजय पर इसलिए शक था क्योंकि इन लोगों ने नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट में ऐसी कई बातें बोली थी जिसने यह पता लगता था कि ये लोग हत्या के दोषी हैं. दूसरी ओर डॉक्टर राजेश और नुपुर तलवार के नार्को या पॉलीग्राफ में ऐसी कोई भी बात सामने नहीं आई जिनसे इन लोगों के अपराध में शामिल होने की संभावना पैदा होती हो. इन टेस्टों के अलावा कृष्णा के कमरे से सीबीआई ने बैंगनी रंग का एक तकिया भी बरामद किया था जिस पर हेमराज के खून के निशान थे. यह सबूत इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ समझा जा रहा था. लेकिन जब यह मुद्दा अदालत में उठा तो नई सीबीआई टीम के अध्यक्ष ने इसे यह कहते हुए नकार दिया कि यह तकिया असल में हेमराज के ही कमरे से मिला था और टाइपिंग की गलती के चलते इस पर यह लिख दिया गया कि यह कृष्णा के कमरे से मिला है.
निष्पक्ष गवाहों ने बदले बयान
इस मामले को यह तथ्य भी कुछ रहस्यमयी बना देता है कि कई निष्पक्ष गवाहोंने भी इस मामले में अपने बयान बदले हैं. आरुषि और हेमराज के शवों का पोस्टमॉर्टेम करने वाले डॉक्टर. आरुषि का पोस्टमॉर्टेम डॉक्टर दोहरे ने किया था. पोस्टमॉर्टेम के दौरान उन्होंने आरुषि के निजी अंगों में कुछ भी असमान्य नहीं पाया था. आरुषि की पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में भी ऐसा कुछ नहीं था जो बताता हो कि उस पर यौन हमला हुआ था या उसके निजी अंगों से कोई छेड़छाड़ हुई थी. पोस्टमॉर्टेम के बाद भी इस तरह की कोई बात डॉक्टर दोहरे ने न तो नॉएडा पुलिस को बताई थी, न सीबीआई को और न ही एम्स की उस डॉक्टरों की टीम को जिसके वे खुद भी सदस्य थे. लेकिन जब मामले की जांच सीबीआई की नई टीम करने लगी, जो तलवार दंपति को ही दोषी मान रही थी, तब पहली बार डॉक्टर दोहरे ने कहा कि आरुषि के निजी अंगों में असामान्य रूप से फैलाव था और ऐसा भी लग रहा था कि मरने के बाद भी उसके निजी अंग साफ़ किये गए हैं.डॉक्टर दोहरे का यह बयान पोस्टमॉर्टेम के लगभग डेढ़ साल बाद आया. पोस्टमॉर्टेम करने के बाद वे कुल पांच बार अपना बयान दर्ज करा चुके थे लेकिन ऐसी कोई भी बात उन्होंने पहले नहीं कही थी. कुछ ऐसा ही हेमराज के पोस्टमॉर्टेम के मामले में भी हुआ जो डॉक्टर नरेश राज ने किया था. उन्होंने भी पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में कुछ असामान्य दर्ज नहीं किया था लेकिन न्यायालय में बयान देते हुए उन्होंने कहा कि हेमराज के निजी अंग में सूजन था जिससे ये शक होता है कि उसकी हत्या सेक्स करते हुए या उससे ठीक पहले की गई थी.
कई सवालों के जवाब गायब ?
आरुषि हेमराज हत्याकांड में तलवार दंपति को हुई सजा पर इसलिए भी सवालिया निशान लगता रहा क्योंकि इस मामले में कई गंभीर सवालों के जवाब न तो जांच के दौरान जांचकर्ता ढूंढ पाए और न ही न्यायालय में अभियोजन पक्ष साबित कर पाया. जैसे ये सवाल कि हेमराज की मौत कहां हुई? अभियोजन की कहानी के अनुसार हेमराज और आरुषि, दोनों की हत्या आरुषि के कमरे में हुई थी. लेकिन आरुषि का कमरा, जहां उसका खून बिखरा पड़ा था, वहां हेमराज के खून का एक भी निशान नहीं था. इससे यह तो साफ़ था कि हेमराज की हत्या कहीं और की गई थी. हेमराज का शव घर की छत से बरामद हुआ था. विशेषज्ञों ने जब इस जगह और हेमराज के शव का परीक्षण किया तो पाया कि उसके शव को किसी चादर में रखकर छत पर घसीटा गया था. इस कारण विशेषज्ञों ने माना कि हेमराज को छत पर भी नहीं मारा गया था. क्योंकि यदि उसकी हत्या छत पर ही हुई होती तो हत्या करने वाले को उसकी लाश घसीटने के लिए पहले उसे चादर में रखने की जरूरत नहीं पड़ती. घर के बाकी किसी हिस्से में भी हेमराज का खून नहीं था इसलिए यह तथ्य भी एक रहस्य ही है कि उसे कहां मारा गया.
वो तथ्य जिसने तलवार दंपति का पक्ष मजबूत किया
राजेश और नुपुर तलवार के कपड़े भी उनके निर्दोष होने की संभावना बताते हैं. हत्या होने से कुछ ही घंटे पहले आरुषि ने अपने कैमरे से कुछ तस्वीरें ली थीं. इन तस्वीरों में जो कपड़े राजेश और नुपुर तलवार पहने हुए दिख रहे थे, वही कपड़े उन्होंने अगली सुबह भी पहने हुए थे. इन कपड़ो में कहीं भी हेमराज के खून के निशान नहीं थे. आरुषि का खून इनमें जरूर था लेकिन जांचकर्ताओं ने भी यह माना है कि यह खून तब लगा होगा जब वे अपनी बेटी की लाश से लिपट कर रो रहे थे.
कमजोर तर्क और तथ्य बने बेगुनाही का कारण
सजा सुनाने से पहले जब निचली अदालत ने 39 सरकारी गवाहों, सबूत के 247 नमूनों, विशेषज्ञों की सैकड़ों रिपोर्टों, अभियोजन के हजारों दस्तावेजों और दोनों पक्षों की अनगिनत दलीलों को परखा तो माना कि इस मामले में भले ही कोई सीधा सबूत यह नहीं कहता कि हत्याएं तलवार दंपति ने ही की हैं लेकिन कई सबूत ये जरूर कहते हैं कि ये हत्याएं उनके अलावा किसी और ने नहीं की. इसलिए न्यायालय ने माना कि इस मामले में कुछ खामियों के बावजूद भी तलवार दंपति को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता. लेकिन सीबीआई अदालत के इस फैसले को उच्च न्यायालय ने गलत माना और तलवार दंपत्ति को बरी कर दिया है.


इस पूरी घटना में एक बात साफ है कि 9 साल पहले हुई आरुषि की हत्या की बार बार सिस्टम भी हत्या ही कर रही है तो ऐसे में सवाल है कि अब सीबीआई क्या करेगी ? क्या सीबीआई नए सिरे से जांच करेगी ? क्या सीबीआई तलवार दंपति को ही दोषी मानकर आगे बढ़ेगी? क्या सीबीआई कोर्ट के फटकार के बाद दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान देगी क्या सीबीआई आरुषि और हेमराज को इंसाफ दे पाएगी ? या फिर सीबीआई को किसी विदेशी जांच एजेंसी की सहारा लेना होगा ?  

Sunday, October 8, 2017

खुलासा - अडाणी के आगे बेबस है दो देशों की व्यवस्था ?

https://www.youtube.com/watch?v=6GDLHtH4zhc


तो क्या देश में सरकार के नाम पर मुखौटा पीएम मोदी का है और असल चेहरा गौतम अडाणी का है ? ये सवाल महज इसलिए नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री आए दिन उद्योगपति गौतम अडाणी के हवाई जहाज में सफऱ करते हुए पाए जाते है बल्कि ये सवाल इसलिए है क्योंकि जिस तरह से भारत सरकार और यहां तक की ऑस्ट्रेलिया की सरकार अडाणी पर पैसे छिड़क रही है वो वाकई कई संदेह पैदा करता है. बिना किसी चुनाव के आज बात गौतम अडाणी की हो रही है तो उसके पीछे का तर्क ये है कि एक ऑस्ट्रेलिया का चैनल वो कर गुजरा जो भारत में किसी के बस की बात नहीं थी. जी, ऑस्ट्रेलिया का एक चैनल ABC ने गौतम अडाणी के साम्राज्य की पड़ताल जिस कदर की है उसमें कई परते सामने आई है. अगर आपकी रुची उद्योगपति और राजनीतिक दलों के सांठगांठ को जानने में नहीं है तो फिर ये लेख आप मत पढ़िए आपका वक्त खराब होगा.  तो बात शुरु होती है कि अडाणी को आस्ट्रेलिया के सबसे बड़े कोल खदान का ठेका मिला है जिसका भारी विरोध ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है और वहां कि सरकार का पक्ष है कि इससे 10 हजार नौकरियां पैदा होंगी.    
मुख्य बिंदु
1-      अडाणी की कंपनी पर आरोप है कि टैक्स की चोरी की गई
2-       कंपनी ने विदेशों में फर्जी कंपनियां बनाई
3-      टैक्स हैवन देशों में पैसे ट्रांस्फर किए गए
4-      अडाणी ग्रुप ने तमाम आरोपों को खारिज किया है.

ऑस्ट्रेलियाई चैनल के मुताबिक
दरअसल अडाणी ग्रुप की ऑस्ट्रेलियाई संपत्ति में से एक अबोट प्वाइंट कोल टर्मिनल है, जिसका विस्तार मैके क्वीन्सलैंड तक होना है और वहां 400 किलोमीटर का रेल लाइन भी प्लान है. जो पॉर्ट से सीधे कोयले की खदान तक जाएगा. इस काम में कई कंपनी लगी हुई है और जिस कंपनियों से अडाणी की कंपनी का जुड़ाव है वो टैक्स चोरी के मामले में सवालों के घेरे में है.      
अंग्रेजी में यहां पढ़े-
According to ABC  “Adani Group’s assets in Australia include the Abbot Point Coal Terminal near Mackay in Queensland, a terminal expansion project it has approval to undertake at Abbot Point, and a planned railway line of nearly 400 kilometres from the port to the giant mine it wants to build in the Galilee Basin,”
अस्ट्रेलिया में जो एजेंसी ऑस्ट्रेलियन सिक्योरिटी और निवेशक कमीशन (Australian Securities and Investments Commission  इस तरह के निवेश पर नजर रखती है उसे भी धोखे में रखे जाने की बात कहीं जा रही है. दरअसल अडाणी ग्रुप ने अतुल्य रिसोर्स कंपनी को अपनी कंपनी सूची में दर्शा रखा है, जिसका स्वामित्व अडाणी ग्रुप से ही जुड़ा हुआ है. ये कंपनी एबोट कंपनी के द्वारा कंट्रोल की जाती है लेकिन पड़ताल में मालूम पड़ा की अतुल्य रिसोर्स को पीछे से ब्रिटीस वर्जिन आईलैंड कंपनी जो सिगापुर के साथ साथ कई औऱ टैक्स हैवन जहां टैक्स को बचाया जाता है वहां रजिस्ट्रर्ड है और उसे कंट्रोल कर रही है.. ब्रिटीस वर्जिन आईलैंड आडाणी के बड़े भाई विनोद अडाणी देखते है और विनोद अडाणी कई मामलों में टैक्स हेराफेरी के आरोपी है. उनपर आरोप है कि जानबुझ कर इनलोगों ने मनी लौड़्री का खेल शैल कंपनियों के जरिए किया. जिसके जवाब में अडाणी ने कहा है कि विनोद अडाणी एक एनआरआई है और उनका अडाणी ग्रुप में किसी तरह का हस्तकक्षेप नहीं है. लेकिन अडाणी ग्रुप के काम में विनोद अडाणी की कंपनी को सलिप्तिता बताती है की दाल में कुछ काला है. विनोद अडाणी कई कंपनियों के डॉयरेक्टर है जो ऑस्ट्रेलियन रेल और पॉर्ट की संपत्ति को कंट्रोल करते है. तस्वीरे देख कर आप खेल समझ सकते है.
सौ- abc news


विवाद की दूसरी कडी ये भी है क्योंकि भारत सरकार पर आरोप है कि अडाणी को कोयले की खनन के लिए स्टेट बैंक से 6200 सौ करोड़ का कर्ज दिया गया ! वहीं ऑस्ट्रेलिया में भी अडाणी को सरकार ने 1 बिलियन डॉलर का लोन दिया है. अडाणी की कंपनी पर आरोप ये भी है कि प्राकृति के स्वरुप को भी तबाह किया है. ऑस्ट्रिलिया के पत्रकारों की टीम ने गोवा से लेकर कनार्टक और ऑस्ट्रेलिया का हाल दिखाया जहां पर्यावरण के विरूध लगातार काम हो रहा है और लोगों का जीना दुभर है. वहीं ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार जब गुजरात पहुंचे तो उनसे क्राइम ब्रांच की टीम ने 5 घंटे तक पूछताछ की. सवाल है किसके इशारे पर, गुजरात मोदी औऱ अमित शाह का गढ़ है, साथ ही अडाणी का बेस भी गुजरात का है. ऐसे में मतलब समझा जा सकता है कि कैसे अडाणी फल फूल रहे है और कैसे एक अडाणी के लिए हर सिस्टम को तोड़ने के लिए बेकरार है. सिस्टम की एक तस्वीर और दिखाते है कि कैसे भारत में जारी अडाणी के खिलाफ जांच को सरकार ने रोक दिया. राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) ने कर चोरी के मामले में अडानी ग्रुप के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रोक दिया है। डीआरआई के अतिरिक्त महानिदेशक के वी एस सिंह ने इससे संबंधित एक आदेश जारी कर अडाणी ग्रुप के खिलाफ चल रही जांच को रोकने का निर्देश दिया है। अडाणी के फर्मों पर कथित रूप से आयात किए गए वस्तुओं के मूल्य में हेराफेरी करने और कम टैक्स अदा कर सरकारी खजाने को राजस्व नुकसान पहुंचाने का आरोप है।

 बता दें कि अडानी ग्रुप पर बिजली और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आयात किए गए सामानों का कुल मूल्य बढ़ाकर 3974.12 करोड़ रुपये घोषित करने और उस पर शून्य या कम 5% से कम टैक्स देने के आरोप हैं। राजस्व खुफिया निदेशालय के मुंबई क्षेत्राधिकार के एडीजी के वी एस सिंह ने 280 पन्नों के अपने रिपोर्ट में 22 अगस्त को लिखा है, “मैं विभाग के उस मामले से सहमत नहीं हूं जिसमें कहा गया है कि एपीएमएल (अडानी पावर महाराष्ट्र लिमिटेड) और एपीआरएल (अडानी पावर राजस्थान लिमिटेड) ने अपनी संबंधित इकाई यानी ईआईएफ (इलेक्ट्रॉजन इन्फ्रा होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड) को कथित विवादित सामान आयातित मूल्य से अधिक अधिक मूल्य पर दिया है।  

तो दूसरी तरफ भारत की खनन क्षेत्र की दिग्गज कंपनी अडाणी की ऑस्ट्रेलिया में 16.5 अरब डॉलर की कारमाइकल कोयला खान परियोजना के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न इलाकों में हजारों लोगों ने प्रदर्शन कर रहे है. पर्यावरण और वित्तपोषण के मुद्दों की वजह से परियोजना में पहले ही कई साल का विलंब हो चुका है. अडाणी ऑस्ट्रेलिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जयकुमार जनकराज ने कहा कि कंपनी ऑस्ट्रेलिया में रोजगार सृजन के लिए प्रतिबद्ध है और क्षेत्रीय लोगों से इसे व्यापक समर्थन मिल रहा है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया की सड़कों पर विरोध के बाद भी ऐसा पहली बार हो रहा है कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार किसी के साथ ऐसे मजबूती से खड़ी है. वहीं भारत के शह पर अडाणी की बढ़ती हैसियत भी किसी से छिपी हुई नहीं है. लेकिन जिस तरह से ऑस्ट्रेलिया के चैनल के खुलासे के बाद भी भारत में चुप्पी है खासकर हिंदी मीडिया में वो वाकई कई अनसुलझी बातों की तरफ इशारा करती है.  

-    लेख abc न्यूज़ चैनल के खुलासे पर आधारित है.  


Monday, September 25, 2017

जनतंत्र के 'लूट' का मॉडल है झारखंड !


 झारखंड को बने 17 साल होने को है लेकिन झारखंड के हाथ की लकीरें अब तक नही खिंची है . ऐसा लगता है जैसे मानो अभी झारखंड की किस्मत लिखी जानी हो । लेकिन बीते सालों की कहानी देखी जाए तो ये जरूर कहा जा सकता है कि झारखंड को बना कर भी बनाया नही गया ।  यूं देखा जाए तो राज्य पर सबसे ज्यादा बार राज करने का मौका बीजेपी को मिला, खनिज संपदाओं से भरे राज्य में विकास की गाड़ी अब तक दौड़ नहीं पायी है ।  सरकारें दूसरे दलों की भी बनी लेकिन हर किसी ने राज्य के विकास के जहग खुद के विकास पर ही जोर दिया मसलन राज्य आज भी बिखरा हुआ है और संगठित महज वो लोग है जो इस राज्य पर राज कर रहे है । बात शिबू सोरेन की हो, या बाबूलाल मरांडी की राज्य की जनता ने इन नेताओं पर  अपना खूब भरोसा जताया लेकिन ये भी कुछ खास नजर नही आए। शिबू सोरेन की भूमिका तो राज्य को बनाने में रही लेकिन वो भी पार्टी और बेटे से इधर उधर देख न सके और रोज झारखंड पिछड़ता चला गया ।  मौजूद दौर में राज्य में बीजेपी की सरकार है , बीजेपी को इस बार लगभग जनता ने पूर्ण बहुमत के करीब पहुँचाया लेकिन बीजेपी की सरकार में भी भारी निराशा देखने को मिल रही है,हालांकि सरकार ऐसा नही मानती है ।


सरकार खुद के  1000 दिन को मुंबई से लेकर दिल्ली और दिल्ली से लेकर  मध्यप्रदेश तक प्रचार कर जश्न मना रही है ।  जबकि सच्चाई जमीन पर कुछ और ही है ।  जमीन अधिग्रहण के दौरान अपना हक मांग रहे लोगों पर गोली चलवाने का मामला हो या फिर गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का दांव हो, हर तरफ इन मसलों पर अप्पति है क्योंकि झारखंड का मिजाज तो बिना आदिवासियों के इतर बनाया नही जा सकता, तो ऐसे में झारखंड में विकास की बात आज भी बैमानी सी ही लगती है ।  जिला अस्पतालों की सच्चाई छुपाए नही छिप रही है और सरकारी विभाग का लचर रवैया लोगों की जान तो लेता ही रहा है ।  अब बात रांची की ही ले लीजिए , सेवा सदन अस्पताल के सामने स्थित पार्किंग में एक पेड़ से  शिव सरोज का  झूलता शव मिला था . युवक ने दो गमछे की मदद से फांसी लगा ली थी .  पीएमओ और डीजीपी समेत अन्य अधिकारियों को भेजे गये अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा था कि चुटिया थाना की पुलिस के व्यवहार से क्षुब्ध होकर वह जान देने जा रहा है. उसने अपने पिता को पुलिस के जुल्म से बचाने की भी गुहार लगायी थी. आप सोच लीजिए जिस राज्य की राजधानी में खुलेआम ये सब होता हो वहाँ दूसरे जिलों का हाल क्या होगा ? और सत्ता बेलागम इसलिए भी दिखती है क्योंकि उसे इस बात का अंदाजा बखूबी है कि विपक्ष तो वही घिसीपिटी राजनीति ही करेगा ।  जब धनबाद चंद्रपुरा रेल लाइन को बंद किया जा रहा था तब बीजेपी के सांसद और विधायकों ने चूं तक न कि और जब एक झटके में 30 लाख लोगों को बेसहारा कर दिया गया तो फिर सत्ता में बैठे लोग ही राजनीति पर उतारू हो गए । विधायक से लेकर सांसद और सांसद से लेकर राज्य और केंद्र में सरकार बीजेपी की बावजूद उसके जनता को बेसहारा कर दिया गया । हज़ारो लोग जिनका जीवन उस रेल रुट के सहारे चल रहा था वो एक झटके में लाचार हो गए लेकिन बीजेपी विधायक ढुल्लू महतो से लेकर सांसद पीएन सिंह और गिरिडीह के सांसद रविन्द्र पाडेय जनता को झूठा दिलासा देते रहे और नाम मात्र का विरोध करते रहे, अब असल सवाल की शुरुआत भी यही से है कि सरकार जिनकी है क्या उनकी भी नही सुनी जा रही है ? तो फिर सुनी किसकी जा रही है और सरकार काम किसके लिए और किसके इशारे पर कर रही है ? दरअसल झारखंड को लेकर वादे और संकल्प तो साल 2000 से लिये जा रहे है लेकिन जिस झारखंड में बिरसा को भगवान माना गया उनके घर को भी आज तक सरकारें कंक्रीट का नही बनवा पायी लेकिन राजनीतिक पर्यटन होता रह गया ।


 झारखंड के साथ मूल सवाल आदिवासियों का है लेकिन मौजूदा तस्वीर में झारखंड के आदिवासी उस खोई हुई विरासत की तरह हो गए है जिनकी प्रदर्शनी प्रधानमंत्री, राज्यपाल या किसी विदेशी राजदूत के सामने नाँच और गाने के जरिये ही की जा रही है । आदिवासियों के बच्चों के लिए न तो सही शिक्षा है, न अस्पताल की व्यवस्था, मतलब इलाज के लिए भी आपको राजधानी का ही रुख करना होगा क्योंकि सरकारी मशीनरी अब भी सही तरीके से गांवों में पहुंच नही पायी है और छोटी छोटी बीमारी ही लोगों के मौत की वजह बन गयी लेकिन याद करें तो हर सरकार ने आदिवासियों के हित मे काम करने का वादा किया था । झारखंड में सरकारों की दृढ़ता का अंदाजा इसी से लगता है कि साल 2014 तक के आंकड़े बताते है कि राज्य में 70 प्रतिशत महिलाएं  एनीमिया से पीड़ित है और जच्चा बच्चा मृत्यु दर देश के औसत दर 212 को लांघ कर  261 पर पहुंच चुका है । राजधानी रांची से 200 किलोमीटर दूर आदिवासी इलाका सारंडा की तस्वीर हर उस इंसान को अंदर से हिला के रख देगी जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर यकीन करते हुए वोट किया हो । दरअसल 2017 में सरकार के आंकड़े मानते है कि वहाँ 20 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है जबकि सच्चाई उससे और अधिक भयानक है ।  न वहाँ पीने का साफ पानी है , न खाने को खाना, लगभग वहाँ के आदिवासी  बरसाती कीड़े को मारकर खाने के कगार पर है ।झारखंड में सरकारी डॉक्टरों के कुल 2900 पद है लेकिन सेवा 1600 डॉक्टर ही दे रहे है । राज्य में महज 3 सरकारी मेडिकल कॉलेज है जो मात्र हर साल 200 डॉक्टर ही राज्य को दे रहे है । वहीं 29.74 लाख हेक्टयर जमीन साल 2014  में सिंचाई के लिए उप्लब्ध थी लेकिन सिंचाई की सुविधा महज 25 प्रतिशत जमीन पर ही उपलब्ध थी और अब भी हालात नही बदले है । 17 साल के उम्र वाले राज्य में सबसे ज्यादा  राज तो बीजेपी ने किया लेकिन सत्ता का जलवा तो यही है कि मौजूदा सीएम पिछली सरकारों को ही दोष देते दिखते है ।


 रघुवर राज में ही शांत और अपने सौहार्द के लिए जाने जाना वाला राज्य गौ हत्या और मॉब लीनचिंग के लिए बदनाम हो गया है लेकिन सरकार अब भी मान रही है कि राज्य में तो राम राज है । लेकिन सच्चाई यही है कि बीजेपी के विधायक ढुल्लू महतो तकरीबन दर्जनों भर मुकदमा झेल रहे है उसमें रंगदारी मांगने जैसे भी कई आरोप शामिल है , तो वही सीधे तौर पर झरिया विधायक संजीव सिंह भी सरेराह कांग्रेस के नेता और धनबाद के पूर्व डिप्टी मेयर की हत्या के आरोप में जेल जा चुके है , जमशेदपुर में बच्चा चोर के नाम पर बिगड़ती कानून व्यवस्था की तस्वीर भी कोई भूल नही सका है ,तो फिर रघुवर दास किस बिनाह पर राज्य में सब ठीक है का डंका बजा रहे है ? वजह चाहे जो भी हो लेकिन झारखंड के तमाम राजनीतिक दल सत्ता के छावं तले खूब बढ़ रहे है और जनता इन्हीं राजनीतिक दलों के आसरे विकास की बांट जोह रही है जो फिलहाल रघुवर राज में उन्हें नसीब होती दिख नही रही । तो फिर ये कहना तो जायज है कि जिस छोटे राज्य का कॉन्सेप्ट बीजेपी हमेशा देश के सामने देते आयी वहीं बीजेपी छोटे राज्य झारखंड  का विकास करने में विफल है ।

Tuesday, September 12, 2017

कहीं देश को तानाशाह किम जोंग से प्यार तो नही हो गया ?

 लोकतंत्र है क्या बता सकते हो अमा यार छोड़ों तुम का बताओगे, तुम खुद ही नहीं समझ पा रहे हो की तुमको लोकतंत्र से मोहब्बत है या फिर फांसीवाद पर तुम्हारा लस्ट है ? जब पता चल जाएं तो बता देना वैसे उम्मीद नहीं है हमको की तुम लोग कन्विंस भी होते हो  हरियाणा वाला बाबा से हर पार्टी सत्ता के लिए डील तो बारी बारी कर लिया, जिसका नतीजा हुआ न्यायपालिका के आदेश के बाद पब्लिक बौरा गई, गाड़ी जलाई, बिल्डिंग जलाई, मीडिया वालो को मारा और फिर खुद 38 आदमी निपट गया. हालातों ने बताया की सरकार पूरा फेल हो गई है लेकिन सरकार का समर्थक लोग पूरा ढीठ पना दिखाया, उसके पहले हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष का बेटा भी बेटी उठाओ मुहिम में पकड़ाया तो लड़की के करेक्टर पर समर्थक लोग लोटा ले के चढ़ गए. खैर इन सब मामलों के बाद बारी आई गौरी लंकेश की, उसके मारे जाने पर हंगामा इसलिए हुआ क्योंकि कन्नड़ में उन्हें पढ़ा जाता था जिसके वजह से लोग डरे हुए थे कि वो एक्सपोज हो जाएंगे, गौरी लंकेश को किसने मारा ये तो बाद में पता लगेगा लेकिन जो लोग उनकी हत्या को जायज ठहरा रहे थे उनको देखकर मन तो खिन्न हो गया. बताईये महाराज कोई किसी महिला को कुतिया कह रहा है क्योंकि वो आपके जैसा नहीं सोचती, सोच में अलगाव तो एक घर के अंदर भी दिखता है, कई बार पापा लोग भी कुछ अलग राय रखते है और आप कुछ और तो फिर आपके पापा क्या हुए  ? चलिए छोड़िए आप कह रहे है कि सरकार का विरोध करने वाला पत्रकार सब दलाल है ?  दलाल का मतलब आपको पता है जी, और बढ़िया पत्रकार का क्या मतलब है यहीं बता दो अरे तुम लोग तो सब लुल दिमाग का है जानता भी नहीं है कि भाई सरकार में आने से पहले पार्टी कहती थी कि ये करेंगे, वो करेंगे, अब सत्ता में आई तो एक काम की और दुसरा नहीं की तो क्यों न कहे कि सरकार गलत कर रही है ?  कोई हमको गरज तोड़ी था, आप ही न माइक लगा लगा कर वोट मांग रहे थे जी, दिए वोट आपको, फिर गाड़ी भी मिला, सैलरी भी मिला, और पूरा फुटानी आपका पूरा हो रहा है, आम जनता को रोक कर आपको साफा रोड़ दिया जाता है कि आप जहां जा रहे है वहां जल्दी पहुंचइये, भले हम लोग लेट हो जाएं तो कंपनी सैलरी काट लेती है. तो बताईये भाई काहे नहीं बोलेंगे जब आप किया हुआ वादा पूरा नहीं करेंगे तो वोटर है, पत्रकार है, स्वतंत्र राय है, स्वागत कीजिए हमारे आलोचना का, कुछु बोलते है तो आप लोग दलाल दलाल का बाजा बजाने लगते है. 


आपलोगों को क्या नॉर्थ कोरिया वाला तानाशाह किम जोंग पंसद है जानते भी हैं कुछ उसके बारे में, सुत भी जाइयेगा तो गोली मार देता है, कोई विदेशी फिल्म नहीं देख सकते और आपलोग बताईये हमलोग को सुअर और कुतिया पता नहीं और क्या-क्या बोलते रहते है ?  खैर बौधिक स्तर अगर ठीक हो आपका तो थोड़ा डाटा डाटा खेला जाएं क्या ?  नोटबंदी पर पीएम मोदी ने बोला था कि कालाधन आएगा, आंतकी गतिविधि रुक जाएगी लेकिन कहां कुछ हुआ यार आरबीआई की रिपोर्ट है कि नोटबंदी के दौरान बैन किए गए 1000 रुपये के पुराने नोटों में से करीब 99 फीसदी बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट आए हैं. 1000 रुपये के 8.9 करोड़ नोट नहीं लौटे हैं. पिछले साल नवंबर में लागू की गई नोटबंदी के दौरान देश में प्रचलन में रहे 15.44 लाख करोड़ रुपये के प्रतिबंधित नोट में से 15.28 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट कर आ गए हैं. सत्ता में आने से पहले बोल रहे थे कि पाकिस्तान को मार के धांस देंगे. मोदी सरकार के तीन साल और यूपीए के आखिरी 3 सालों के मुकाबले कश्‍मीर में आतंकवाद से 42 फीसदी ज्‍यादा मौतें हुई. मोदी के शासनकाल के तीसरे साल में जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद के कारण 293 मौतें हुईंजो इसी सरकार के दूसरे साल के कार्यकाल में हुई 191 मौतों से 53 फीसदी अधिक रहा. बीते साल की तुलना में इस साल आतंकवादी हमलों में 61 फीसदी अधिक जवान शहीद हुए. उधर राष्ट्रवाद का सरकार बांसुरी बजाती रही और देश के जवान मरते रहे. एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जवानों की समस्याएं सुलझाने में नरेंद्र मोदी सरकार नाकाम रहीहर साल में 100 से ज्यादा सैनिक अब भी खुदकुशी करते है. बताइये महाराज पहले 60 रुपया का तेल और दाल हमलोग लाते थे तो मनमहोन सिंह को क्या क्या नहीं कहा गया, अब दाल 80-100 से ऊपर रहती है, जैसे 60 रुपया तो सौतन हो उसकी और तेल भी 70 के ऊपर है, जबकि पहले 60 का तेल तब मिलता था जब क्रूड ऑयल 120 डॉलर प्रति बैरल था लेकिन वहीं क्रूड ऑयल अब 54 डॉलर प्रति बैरल है और दाम 70 के उपर, देश की सरकार पर कोई सवाल अब उठाया नहीं जा सकता पता नहीं कब और कौन बोले की देखो भारत मां के प्रति समर्पित सरकार पर उंगल कर रहा है ?

भाई इससे बढ़िया तो पिछली लूटने वाली सरकार थी बताओ उतना लूटा फिर भी दाल 60 का खिलाई और राष्ट्रवादी लोग जब सत्ता में आए, भ्रष्टाचार भी बंद है और अंबानी अडानी को कोई फायदा भी नहीं दे रहे हैं तो दाल तेल सब मुहं फुला के ऊपर कैसे चढ़ गया है ?  ज्यादा बोलेंगे नहीं, पता चला की आप हमको भी फर्जी हिंदू बताके कभी पेल दीजिएगा. उ क्या है न कि आपलोग को हिंदू मुसलमान करके झगड़ा करने में बहुत मजा आता है इससे सबके दिमाग में से जितना स्वास्थ्य, शिक्षा का मुद्दा है सबका बत्ती बन जाता है, बाद बाकी यार सरकार की आलोचना करते है और करते रहेगे. लोकतंत्र है क्या इसका रिसर्च कर लीजिए समझे 

Tuesday, August 15, 2017

गोरखपुर हादसे ने योगी की नीयत को एक्सपोज़ किया है ?

तो बच्चो की मौत ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई ये ऐलान यूपी के सर्वे सर्वागोरखनाथ मठ के महंत और यूपी के सीएम मंहत योगी आदित्यनाथ ने कर दिया...ऐसे में फिर एक योगी की बात को समाज जस का तस स्वीकार करेगा या खारिज कर देगा ये बड़ा सवाल है ... महज चंद घंटो में 36 बच्चों की मौत हुई लेकिन राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार ने इस बात को खारिज कर दिया वो अलग बात है कि आरोपों के  खारिज होने के बाद भी सरकार जांच की दरियादिली दिखा रही है लेकिन सवाल है कि जब मौते समान्य है तो फिर जांच किस बात का करवाएगी. वैसे भी स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने तो साफ साफ कह ही दिया है कि अगस्त में बच्चो की मौत तो होती ही है... 10 अगस्त को अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट चलाने वाले कर्मचारियों ने सीएमओ को लिखा कि आक्सीजन का स्टॉक खतरनाक रूप से कम हो चुका है और रात तक के लिए भी नहीं बचा है. ऑपरेटर ने अस्पताल प्रशासन से गुहार लगाई कि जल्दी कीजिए मरीज़ों की ज़िंदगी ख़तरे में है. यह दूसरा पत्र था. एक हफ्ता पहले भी ऐसा ही पत्र लिखा जा चुका था जिसका कोई जवाब उन्हें नहीं मिला.  जिस अस्पताल का दौरा राज्य के मुख्यमंत्री एक महीने में दो बार करते होंमेडिकल शिक्षा सचिव एक महीने में दो बार जाती होंस्वास्थ्य सचिव भी दौरा करते होंवहां ये घटना क्यों हुई जबकि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी ने कानूनी नोटिस भी भेजा था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जुलाई को भी आए थे और अगस्त को भी. इसके बाद भी इस अस्पताल की अनेक समस्याएं दूर नहीं हुईं. कुछ वार्ड की हालत ऐसी है कि जानकर लगेगा कि ये अस्पताल चल कैसे रहा था. और सारे प्रमुख व्यक्तियों के दौरे के बाद भी वो कौन सी शक्ति थी जो इसमें सुधार नहीं होने दे रही थी.एंसेफलाइटिस के उपचार के लिए फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैब विभाग के सभी कर्मचारियों को 28 महीने से वेतन नहीं मिला है. आज की तारीख तक किसी को वेतन नहीं मिला है. वेतन न मिलने के कारण डॉक्टर छोड़ कर चले गए. इस बाबत गोरखपुर न्यूज़लाइन के मनोज सिंह ने दि वायर के लिए एक ख़बर भी छापी थी.इस विभाग में अब कोई डॉक्टर नहीं है, 11 थेरेपिस्ट बचे हैं जिन्हें वेतन का इंतज़ार है.एक और वार्ड है जिसके स्टाफ को पांच महीने की देरी के बाद घटना से दो दिन पहले वेतन मिला था. इसी अस्पताल के नियो नेटल विभाग के छह महीने से सैलरी नहीं मिली है. इन्हें भी हाल में सैलरी मिली है. दरअसल सरकारी अस्पतालों की एक ऐसी छवि गढ़ दी जाएगीजहां कि वे सबसे बेकारलापरवाह और उनमें जाना यानी मौतों को दावत देना. निजीकरण को समाज में थोप देने का इससे सस्ता और आसान रास्ता कोई और है भी नहींजिसके दम पर निजी स्वास्थ्य और शिक्षा सरीखी सेवाएं बेहद आसानी से अपना लक्ष्य हासिल कर रही हैं. अब जरा आप यूपी का स्वास्थ्य बजट देख लिजिए.... जब योगी जी आप यूपी सरकार का बजट पेश कर रहे थे तब आपने हेल्थ के बजट को लेकर जरा भी गंभीरता नहीं दिखाई. आप 2017-2018 के सिर्फ13692 करोड़ रुपए प्रस्तावित किए. जो कि पिछले बजट से भी कम हैं. यह बजट भी यह कहकर दिया कि 108 नंबर वाली 712इमरजेंसी एंबुलेंस खरीदेंगे. क्या आप भूल गए कि आपके प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी लचर है. बीते दशकों में बच्चों के लिए काल बन रही इंसेफेलाइटिस से 18 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. मगर पिछले 34 सालों मे अकेले आपके शहर गोरखपुर मे 25 हज़ार से ज़्यादा मासूम मौते हुई लेकिन कार्रवाई के नाम पर क्या हुआ..2014 में मोदी सरकार के आने के बाद भी पूर्वांचल की इस त्रासदी को रोकने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया. शुक्रवार को जब अचानक बीआरडी कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी के चलते एक साथ 30 बच्चों की मौत की खबर आई और उसमें योगी सरकार को घिरता देखा तो आनन-फानन में केन्द्र सरकार हरकत में आई. केन्द्र सरकार ने घोषणा की है कि गोरखपुर में मेडिकल रिसर्च सेंटर स्थापित करवाएगा. यह सेंटर बच्चों की बीमारियों पर रिसर्च करेगा और उन बीमारियों से लड़ने के लिए टीकों को विकसित करेगा. अपने गोरखपुर दौरे के वक्त केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने रविवार को इस बात की घोषणा की. उन्होंने कहा कि रिसर्च सेंटर बनाने के लिए केन्द्र सरकार 85 करोड़ रुपए खर्च करेगी. यहां आप ये भी जान लिजिए कि मोदी सरकार ने 2016 में 750 बेड वाले एम्स अस्पताल के निर्माण को मंजूरी दी थी और साथ ही साथ जुलाई 2016 में पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद उसकी नींव रखी थी. लेकिन एम्स 2019 से पहले बनने की हालात में नहीं है. ऐसे में बीआरडी मेडिकल कॉलेज ही है जो पूर्वी उत्तर प्रदेशपश्चिमी बिहार और नेपाल के तराई इलाकों के तकरीबन 10 करोड़ लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करवा रहा है. लेकिन ये सस्ती स्वास्थ्य सेवा के पीछे की सच्चाई से तो आपका सामना हो ही गया है... सीएजी ने 2011 से 2016 तक राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का हिसाब किताब किया है. गांवों कस्बों में स्वास्थ्य की हालत के लिए यह योजना बहुत महत्वपूर्ण है. सीएजी ने कहा है कि 27 राज्यों ने इस योजना के मद में दिए गए पैसे खर्च ही नहीं किए. 2011-12 में यह रकम 7,375 करोड़ थी. 2015-16 में 9509 करोड़ थी. ये वो राशि है जो ख़र्च नहीं हो सकी. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हमारे देश में सैकड़ों ऐसे स्वास्थ्य केंद्र हैं जो बहुत ही गंदे हालात में काम कर रहे हैं. 20 राज्यों में 1285 प्रोजेक्ट कागज़ों पर ही पूरे हुए हैंमगर असलियत में शुरू भी नहीं हुए हैं. क्या आपने सुना है कि इन 1285 प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई है.  वार्षिक परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक जो जन्म लेने के सात दिन के अंदर जिंदा नहीं रह पाते जिसे हम तकनीकी भाषा में नवजात शिशु मृत्यु दर कहते हैं इसमें शीर्ष 100 जिलों में 46 उत्तप्रदेश के खाते में आते हैं. हमने उनसे बड़े बच्चों यानी शिशु मृत्यु दर (जो बच्चे जो अपना पहला जन्मदिन ही नहीं मना पाते) पर नजर डाली तो उसमें भी शीर्ष 100 जिलों में सबसे ज्यादा जिले उत्तरप्रदेश के हैं. और जब हमने उससे भी बड़े यानी पांच साल तक के बच्चों अर्थात बाल मृत्यु दर को देखा तो उसमें भी उत्तरप्रदेश ही आगे खड़ा हुआ है. इन परिस्थितियों से गुजरते हुए आप इस बात को समझ गए होंगे की देश कहा खड़ा है ... मेरा सवाल फिर गोरखपुर पर ही आकर रुकता है कि क्या सरकार को जितनी संजीदगी इस मामले में दिखानी थी क्या सरकार ने दिखाई या फिर महज राजनीति के इर्द गिर्द गंभीर बयान देकर आपना पिंड छुड़वा लिया...अब तो सरकारों के खिलाफ बोलने से पहले सोचना भी होगा क्यों देश में जनता से ज्यादा लोग राजनीतिक समर्थक हो गए है और तो और सरकारें देश हो गई है, सरकार की आलोचना देश की आलोचना के समान है.