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मोदी जी! कतरास और मेरी पहचान मिटाने का दोषी कौन ?

देश की सत्ता जहाँ से चलती है वहाँ से 1280 किलोमीटर दूर मेरी एक पहचान मिट गई । अब मैं उसके बारे में सिर्फ यादों के हिसाब से बात कर पाऊंगा । कभी वहाँ जाकर उसका प्रत्यक्षदर्शी नही बन पाऊंगा । पीएमओ और रेल विभाग ने झारखंड के जिला धनबाद के अंतर्गत आने वाले कतरास गढ़ और चंद्रपुरा रेल लाइन को बंद कर दिया है । तकरीबन 32 किलोमीटर की रेल लाइन बन्द हो गयी ।  सरकार कह रही है कि रेल की पटरियों के नीचे आग का दरिया बह रहा है जो कभी भी ट्रेन में सफर करने वाले हज़ारों लोगो को अपने अंदर ले सकता है । तो जाहिर है कि सरकार ने जनहित में ये फैसला ले लिया । आप लोग मेरे यादों से बहुत दूर है तो सबसे पहले आपका और मेरी यादों का परिचय होना जरूरी है । मैं वही कतरास और चंद्रपुरा के बीच रहता था । मंडल केंदुआडीह के पास एक रेलवे हाल्ट है बुदौढा । हम ,पापा और मेरे बड़े भाई अक्सर शनिवार को यहाँ से ट्रेन पकड़ के कतरास जाया करते थे और ये लगभग हर हफ्ते होता था । पापा घर के लिए समान खरीदने जाते और हम और भैया मीठा खोआ वाला समोसा खाने । कतरास हमारे इलाके का आज भी सबसे बड़ा बाजार है धनबाद और झरिया के बाद । कतरास का दुर्गा पूजा तो आस पास के जिलों तक प्रचलित है । दुर्गा पूजा में यहाँ मेला घूमने करोड़ों लोग आते है । भीड़ इतनी की पैर नही रख सकते । हम भी जाते थे । पाप लेकर जाते थे उसी बुदौढा स्टेशन से कतरास तक । कतरास में मेला लगता था,मौत का कुआं,ब्रेक डांस,तारा माची । ट्रेन में इतनी भीड़ होती थी कि एक रुपया का सिक्का भी नही रखा जा सकता था लेकिन पापा मुझे कंधे पर बिठा लेते थे ,फिर हम मेला घूमते,खिलौना खरीदते और घर लौटते वक्त माँ और दीदी के लिए ढेर सारी मिठाई लेकिन वो मिठाई भी हम ही खाते थे घर पर ।ऐसा बरसों तक होता रहा जब तक हम वहां रहे । आज भी जब जाता हूं तो मेरी पहली कोशिश होती है कि कतरास उतरु । खैर अब ये सब महज याद है क्योंकि अब ये रेल लाइन बन्द हो गया । आखिर ये रेल लाइन बन्द क्यों हुई ये भी जान लीजिए । धनबाद का पूरा इलाका कोयले से भरा हुआ है । ये कोयले की कटाई 100 साल से अधिक वक़्त से हो रही है । कोयला  निकाल कर उस जहग पर बालू भरने का रिवाज है लेकिन भ्रष्ट तंत्र,नेता,ठेकेदारों ने इसमें खेल किया और कागजों पर  बालू भराई को दिखाया ,नतीजा ये हुआ कि पैसे कमाने के खेल में ये काम कई सालों तक किया गया और जमीन के अंदर आग लग गई । ऊपर से धनबाद का कोयला कोकिंग कोल ( कोयला दो तरह का होता है कोकिंग और नॉन कोकिंग कोल, कोकिंग कोल ज्यादा कीमती होता है ) ।  जमीन में आग लगने के बाद भी इसपर किसी ने ध्यान नही दिया और आग बढ़ती गयी , आज के वक़्त में वहा आपको जमीन के अंदर से निकलते धुंए दिन में भी साफ साफ दिखेंगे  । धनबाद से लेकर चंद्रपुरा के बीच कुल 13 रेलवे स्टेशन  प्रभावित हुए है ,इनके आस पास हज़ारो लोगो का घर चलता था,बाजार चलता था सब उजड़ जाएंगे । मुझे आज भी भोला झालमूढ़ी वाला याद है ,ट्रेन में झालमूढ़ी बेचता था और गाना गाता था,चुटकुले सुनता था, आज भोला जैसे सैकड़ों लोग बर्बाद हो गए है ।कोयला मंत्रालय और रेल मंत्रालय इस बात के लिए लड़ रहे है कि पटरियों की शिफ्टिंग का खर्चा कौन देगा ? स्टेशन  बन्द है अब इनमे से कोयला निकाला जाएगा ,आउटसोर्स होगा, मुनाफा होगा, जो विधायक और सांसद, नेता आज लोगों के पक्ष में उतर के तमाशा कर रहे है वही लोग कल कोयला निकालने के लिए ठेका लेंगे, अपना परसेंटेज बांधेंगे, पैसा नही देने पर इनके लड़के धमकी भी देंगे । लेकिन सवाल इससे भी आगे का है कि आग को रोकने के लिए वक़्त पर कदम क्यों नही उठाया गया ? अगर उठाया गया तो आग पर काबू क्यों नही पाया जा सका? कौन से लोग इसपर काम कर रहे थे ? उनके फ़ेल होने की जिम्मेदारी किसकी है ?  ऐसे लोगों पर कार्रवाई हुई या कब होगी ? मौजूदा समय मे इलाके के सांसद,विधायक और राज्य और केंद्र में बीजेपी की सरकार है लेकिन किसी ने इस फैसले को रोकने की जहमत नही उठाई ? इस रूट पर रेल परिचालन की बन्दी की मंजूरी  पीएमओ ने दी है । क्या पीएमओ ने ये नही पूछा कि इन स्टेशन पर निर्भर लोगो की  जिंदगी का क्या होगा ? ये लोग अपना पेट कैसे पालेंगे ? क्या पैसे के खेल में जिंदगी की कोई मायने नही है ?  इलाके के मौजूदा विधायक ढुल्लू महतो, सांसद पीएन सिंह सड़को पर है लेकिन ये लोग साल भर से कहा थे ? अखबारों में बयान छपवाने के अलावा क्या किया है ? ये मसला सिर्फ रेल लाइन का नही लाखों लोगों की जिंदगी का है, कोयला निकासी में हुए व्यापक भ्र्ष्टाचार का है । मैं अपने तमाम साथियों से अपील करता हूँ कि हमे अब लाखों लोगों को भूखे मरने से बचाने के लिए कदम उठाना होगा । ये वक़्त बहुत मुश्किल है , राज्य में विपक्ष के लोग सुस्त है, स्थानीय नेता ढुल्लू महतो से टकराने की हिम्मत नही रखते, सांसद से सवाल पूछने वालों का क्या होगा ये हम जानते है । मीडिया अब भी चरण वंदना में जुटा है लेकिन क्या हम लोगों को मरने के लिए छोड़ दे ? भ्रष्ट तंत्र की साजिशों का भेंट मेरे बचपन का एक अहम हिस्सा चढ़ गया। ये ठीक मेरी यादों को मिटाने जैसा है । ऐसे लाखों लोग है जिनकी यादे और जिंदगी इस रेल  रूट से जुड़ी है तो क्या सत्ता सिर्फ तमाशबीन बनी रहेगी , मुस्कुराती रहेगी, मुनाफा कमाएगी या उजड़ती जिंदगी और यादों को बचाने के लिए कोई उठाएगी,  यही असल सवाल है ।

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मौत के बाद पहला इन्टरव्यू

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