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शहाबुद्दीन कैसे बने ‘साहेब'



तो 63 मुकदमों से घिरा, गैंगस्टर होने का आरोप झेल रहा, बाहुबली का तमगा पा चुका शख्स मोहम्म्द शहाबुद्दीन भागलपुर जेल से जमानत पर रिहा हो गए लेकिन उनको जमानत मिलने मात्र से बिहार की सियासत गरमा गई है. बीजेपी ने नीतीश सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार ने जानबूझ कर शहाबुद्दीन के केस में कमजोर पैरवी की है जिससे शहाबुद्दीन को जमानत मिल गई. वही सोशल मीडिया पर भी बिहार के लोगों से लेकर बिहार की सरकार तक को लोग दुत्कार रहे है लेकिन मैं आपको राजनीति नहीं बल्कि शहाबुद्दीन के बारे में कुछ अहम चीजें बताउंगा. मेरी इस लेख को पढ़कर आप ये समझ सकेंगे की क्यों बिहार के सिवान जिले में एक बड़ा तबका शहाबुद्दीन की पैरोकारी करता है.जी,तो सबसे पहले 1982-87 के दौर में चलिए जहां से शहाबुद्दीन के साहेब बनने का सफर शुरू हुआ. दरअसल शहाबुद्दीन को खुद को साहेब कहलवाने का बहुत शौक था लेकिन 1982-87 के दौर में लोग शहाबुद्दीन को शहाबुद्दीन के नाम से ही जानते थे.1980 का दौर और उससे पहले सिवान जिला कामरेडो का जिला था मतलब वामपंथियों का लेकिन शुरूआत में क्रांति जैसा मालूम होने वाला वामपंथ सिवान के लिए नासूर बन चुका था क्योंकि सिवान में न सिर्फ वामपंथ हावी था बल्कि माओवादियों का भी खूब बोल बाला था और इसी से त्रस्त होकर सिवान जिले के भुमिहारों ने शहाबुद्दीन को सशक्त करना शुरू कर दिया. भूमिहारों का साथ मिलते ही शहाबुद्दीन के दिन बदल गए. छोटे मोटे कांड में शामिल होने वाला शहाबुद्दीन पैसे और अपने गुर्गों से सश्कत होने लगा.धीरे-धीरे  शुरूआत हुई तो लोग शहाबुद्दीन के पास अपने काम को करवाने पहुंचने लगे और शहाबुद्दीन के यहां दरबार सजने शुरू हो गए.जनता और सत्ता का साथ पाता देख शहाबुद्दीनके हौसले आसामान छूने लगे और इसी कड़ी में शहाबुद्दीन ने माओवादियों और वामपंथियों के घर को खोखला करना शुरू कर दिया. शहाबुद्दीन की ताकत बढ़ती गई और वाम औप माओ सिवान से घटते गए.वाम और माओ के घटने के साथ ही शहाबुद्दीन का रुतवा बढ़ने लगा और लोग शहाबुद्दीन के साथ खड़े होते चले गए. भुमिहारों के समर्थन से खड़ा हुआ शहाबुद्दीन का नाम न जाने कब इतना बड़ा हो गया किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. बढ़ते नाम के साथ शहाबुद्दीन का कारोबार भी बढ़ने लगा और शहाबुद्दीन ने अपने आस पास नाजायज कामों का एक साम्राज्य ही खड़ा कर दिया. ऑटोमेटिक हथियार हो या रंगदारी या फिर हत्या या किसी का अपहरण हो हर जगह बस एक नाम . ऐसे में बढ़ते ताकत के साथ शहाबुद्दीन ने राजनीति में एंट्री बतौर विधायक की लेकिन बाद में देश के लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानि लोकसभा तक जा पहुंचे.सत्ता और बाहुबल के खुमार में डूबे शहाबुद्दीन बिहार का बड़ा और खुंखार चेहरा साबित हुए. लेकिन उससे पहले आप एक किस्सा भी जान लिजीए कि जब शहाबुद्दीन के पिता मरने वाले थे तो सिवान के मशहुर वकील श्रीकांत बाबू से अपने औलाद पर आशिर्वाद बनाए रखने का वादा लेते गए.पहले के जमाने में नैतिकता और जमीर जैसे भारी भरकम शब्दों के सामने वादा बहुत बड़ी चीज हुआ करती थी. ठीक ऐसा हुआ भी, श्रीकांत बाबू के आशिर्वाद  होने के कारण साहेब का मनोबल और बढ़ गया. चुनाव के दौरान 90 के दौर में बूथ कैपचरिंग बेहद आम बात हुआ करती थी औऱ साहेब के लड़को के लिए बूथ लूटना खेल से ज्यादा कुछ था भी नहीं. लेकिन जिस बूथ पर श्रीकांत बाबू को वोट देने जाना होता था उस बूथ के वोटर लिस्ट  पर शहाबुद्दीन खुद हरी कलम से उनके नाम को घेर देते और वहां अपना हस्ताक्षर भी कर देते ताकि बूथ में भोकस वोटिंग के दौरान इस बात का ख्याल उनके लड़के जरूर रखे की श्रीकांत बाबू का वोट कोई औऱ न दे पाए क्योंकि श्रीकांत बाबू वोट देने शाम के 4 बजे आते थे.  ऐसे ही कई कड़ियां मिली और शहाबुद्दीन धीरे-धीरे साहेब बनते चले गए.जब सिवान की जनता वाम और माओ से परेशान होकर शहाबुद्दीन को चुन रही थी तो किसी ने न सोचा होगा कि शहाबुद्दीन के जरिए वो जिस खौफ को खत्म करना चाहते है वो खौफ एक दिन खुद शहाबुद्दीन के रूप में उनके सामने खड़ा होगा.सिवान का एक धड़ा शहाबुद्दीन को रोबिन हुड का अवतार भी मानता है क्योकिं डॉक्टरों, व्यापारियों, इंजिनियरों से रंगदारी लेने वाले शहाबुद्दीन गरीबों   की मदद में जी खोल कर पैसा भी लूटाते है. गरीब के घर में शादी हो या कोई बीमारी वहां धन शहाबुद्दीन ने जी खोल कर खर्चा इसलिए सिवान का एक तबका मुसलमानों के अलावा भी उन्हें रहनुमा मानता है.तो वही शहाबुद्दीन को खडा करने वाले भूमिहारों को भी शहाबुद्दीन ने कभी आंख तिरछा कर नहीं देखा.राजनीति में भारी सफलता ने शहाबुद्दीन को ऐसी खुमारी दी कि सिवान में कोई बड़ी लूट हो या फिर हत्या या फिर अपहरण हर जगह शहाबुद्दीन के हाथ होने की खबर आने लगी. शहाबुद्दीन को तेजाब कांड के बाद भले ही जेल जाना पड़ा हो और फिर उन्हे चुनाव में हार का मुंह भी देखना पड़ा हो लेकिन एक दौर वो भी था किसी भी पार्टी का बड़ा नेता सिवान में कदम रखने से पहले उनकी इज्जात लेकर कदम रखता था. सिवान की धरती पर भले ही प्रभुनाथ सिंह और उमाशंकर सिंह जैसे बाहुबली नेताओं ने अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की हो लेकिन सिवान की धरती पर शहाबुद्दीन जैसा न कोई था न कोई मौजूदा दौर में हैं और अब शायद ही सिवान फिर किसी को शहाबुद्दीन बनाएं. 

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